सत्ता के पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा अपने ही खिलाड़ियों के प्रति अपमानजनक और humiliating टिप्पणियाँ करना अकल्पनीय है, और अंततः इसी वजह से बीसीबी को उनसे उनकी ज़िम्मेदारियाँ छीननी पड़ीं. सच कहें तो बीसीबी को तब कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जब उन्हें यह अहसास हुआ कि अगर 48 घंटों के भीतर कोई कदम नहीं उठाया गया तो खिलाड़ी एक बार फिर विद्रोह कर देंगे. राजनीतिक आकाओं को खुश करने और मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में नजमुल ने बांग्लादेश क्रिकेट को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया और इस प्रक्रिया में अपनी ही स्थिति को अस्थिर बना लिया.
खिलाड़ियों के खेल ने किया सब फेल!
खिलाड़ियों द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक व्यक्ति की मौजूदगी खास तौर पर अहम थी तमीम इक़बाल. यह अच्छी तरह से जाना जाता है कि वह क्या सोचते हैं, और बांग्लादेश क्रिकेट के एक सच्चे दिग्गज के रूप में तमीम को खिलाड़ियों के साथ बैठे देखना सकारात्मक संकेत था. उनकी मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि खिलाड़ी तमीम-विरोधी नहीं हैं, और यदि सत्ता में बैठे लोगों के सख्त राजनीतिक रुख की वजह से उन्हें टी20 वर्ल्ड कप में खेलने का मौका नहीं मिलता, तो यह खिलाड़ियों के लिए एक बेहद क्रूर झटका होगा.
हार चुका है बांग्लादेश
जो भी हो, हार बांग्लादेश की ही है. वे पहले से ही घिरे हुए हैं, और बीसीबी तथा खिलाड़ियों के बीच रिश्ते बुरी तरह बिगड़ चुके हैं. जहां मेहदी हसन मिराज़ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीसीबी की भूमिका को लेकर शालीनता दिखाई, वहीं नजमुल को शो-कॉज़ नोटिस जारी कर आग बुझाने की बोर्ड की कोशिश खिलाड़ियों को संतुष्ट नहीं कर सकी अंततः बीसीबी को नजमुल को सिस्टम से बाहर करना ही पड़ा.
बर्बाद हो जाएगा बांग्लादेश बोर्ड
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेहदी का यह कहना दिलचस्प था कि बीसीबी की आय का एक बड़ा हिस्सा आईसीसी से आता है, और अगर बांग्लादेश भारत नहीं आता है तो यही आय प्रभावित होगी और इससे न सिर्फ केवल खिलाड़ियों को नुकसान होगा, बल्कि अगर आईसीसी ने टूर्नामेंट में हिस्सा न लेने और भागीदार देशों के समझौते का उल्लंघन करने पर जुर्माना लगाया, तो बीसीबी की वित्तीय स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ेगा.
भारत में खेलना अब मजबूरी
तो अब आख़िरी मंज़िल क्या है? सच कहें तो कोई स्पष्ट अंत नहीं है. किसी भी हाल में बांग्लादेश ही नुकसान में रहेगा या शायद वह पहले ही हार चुका है और अब उन्हें अपने नुकसान को कम से कम करने और कोई सम्मानजनक समाधान खोजने की ज़रूरत है. यह बात कि आईसीसी ने बीसीसीआई से अब तक कुछ भी नहीं कहा है, इस तथ्य से साफ है कि बांग्लादेश के मैचों के टिकटों की बिक्री बिना किसी रुकावट के जारी है.
बीसीसीआई ने बिल्कुल सही तरीके से चुप्पी साध रखी है. आईसीसी के नरम न पड़ने की स्थिति में अब बीसीबी के पास दो ही विकल्प हैंया तो वह विनम्रता दिखाए, या फिर दिखावटी सख्ती बनाए रखे और इसके बदले वित्तीय नुकसान झेले तथा अपने खिलाड़ियों को और दूर करे.
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