सूर्यकुमार यादव की कहानी यह सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि 25 साल लंबे सब्र, अलग सोच और निडर बल्लेबाज़ी की कहानी है.अहमदाबाद की वह ऐतिहासिक रविवार की रात. जैसे ही न्यूज़ीलैंड का आख़िरी विकेट गिरा, पूरे स्टेडियम में शोर का सैलाब उमड़ पड़ा. आतिशबाजी से आसमान रंगीन था और भारतीय खिलाड़ी मैदान पर इतिहास लिख रहे थे. लेकिन उस उन्माद के बीच, कप्तान सूर्यकुमार यादव कुछ पलों के लिए बिल्कुल ठिठक गए.
ना ‘टायर्ड’ ना ‘रिटायर्ड’
यह वह ख़ामोशी थी जो अक्सर एक लंबी और थका देने वाली चढ़ाई के बाद चोटी पर पहुँचने पर महसूस होती है. 35 साल की उम्र में, जब उनके दौर के बहुत से खिलाड़ी संन्यास की योजनाएँ बना रहे होते हैं, तब ‘लेट ब्लूमर’ कहे जाने वाले सूर्या भारत को टी20 विश्व कप जिताने वाले कप्तान बन चुके थे. उनके चेहरे पर आँसू नहीं थे, बस वही चिर-परिचित मुस्कान थी. चौड़ी, बेफ़िक्र और हल्की सी शरारत लिए हुए. शायद इसलिए, क्योंकि सूर्या जानते थे कि यह जीत सिर्फ़ एक रात की नहीं है. यह उस ढाई दशक लंबे सब्र का इनाम है जो मुंबई की एक शांत कॉलोनी के धूल भरे मैदान से शुरू हुआ था.
गलियों से हुआ सफर का आगाज
मुंबई का अनुशक्ति नगर इलाका क्रिकेट के शोर-शराबे वाले मशहूर मैदानों से बहुत अलग है. यहीं सूर्या के पिता, जो एक वैज्ञानिक थे, अपने 10 साल के बेटे को अशोक असवालकर के क्रिकेट कैंप में ले गए थे. उस कैंप की एक रीत थी. नेट्स पर हमेशा भीड़ रहती थी. सीनियर खिलाड़ी पहले बल्लेबाज़ी करते थे और जूनियर बच्चों को सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता था. अक्सर दोपहर ढलते-ढलते कई बच्चे मायूस होकर घर लौट जाते. लेकिन सूर्या अलग मिट्टी का बना था. कोच असवालकर याद करते हैं कि जब बाकी बच्चे चले जाते, तब भी वह लड़का वहीं रहता. अगर उसे बैटिंग नहीं मिलती, तो वह बाउंड्री से गेंदें उठाकर वापस फेंकता या सीनियरों के लिए ड्रिंक्स लेकर आता.
30 की उम्र में मिली जर्सी
भारतीय क्रिकेट की गला-काट प्रतियोगिता में 30 की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट शुरू करना किसी चमत्कार से कम नहीं है. सूर्या ने मुंबई के लिए रनों का अंबार लगाया, आईपीएल में चमक बिखेरी, लेकिन टीम इंडिया की कैप उनसे साल-दर-साल दूर भागती रही. चयन समितियों की बैठकें आतीं और जातीं. युवा खिलाड़ी डेब्यू करते. लेकिन सूर्या वहीं रहे. अनुशक्ति नगर के उस लड़के की तरह जो नेट के किनारे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था.उन्होंने इस इंतज़ार को कुंठा नहीं बनने दिया. बल्कि अपनी बल्लेबाज़ी में वो ‘रोशनी’ पैदा की जिसने क्रिकेट की पारंपरिक किताबों को गलत साबित कर दिया.
सबका साथ टीम का विकास
सूर्या की कप्तानी की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी है. ड्रेसिंग रूम में वे कप्तान से ज्यादा ‘बड़े भाई’ नज़र आते हैं. उनके लिए रिश्ते तकनीक से बड़े हैं. इसका सबसे भावुक उदाहरण तब दिखा जब टी20 विश्व कप के दौरान रिंकू सिंह ने अपने पिता को खोया. सूर्या ने न सिर्फ उन्हें गले लगाया, बल्कि घंटों साथ रहकर यह सुनिश्चित किया कि वे मानसिक रूप से दोबारा मैदान पर उतरने के लिए तैयार महसूस करें. सूर्या का मंत्र साफ है. खिलाड़ियों में डर का अभाव होना चाहिए ताकि वे बिना किसी दबाव के अपना स्वाभाविक और फियरलेस खेल खेल सकें.
रबर बॉल से बनाया रसूख
आज जब सूर्या मैदान पर उतरते हैं, तो गेंदबाज लाचार नज़र आते हैं. वे गेंद को वहां भेजते हैं जहां फील्डर होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. फाइन लेग के ऊपर से हैरतअंगेज स्कूप हो या उनका मशहूर सुपला शॉट. उनकी बल्लेबाज़ी में जोखिम और रचनात्मकता का अद्भुत संगम है. दिलचस्प बात यह है कि बचपन में उन्हें सिर्फ सीधा बल्ला चलाने की ट्रेनिंग मिली थी. कोच बताते हैं कि उनकी यह रचनात्मकता बारिश के दिनों में रबर की गेंद से खेलते हुए विकसित हुई. गीली गेंद की रफ्तार से बचने के लिए उन्होंने जो तकनीक विकसित की, वही आज दुनिया के लिए पहेली बनी हुई है.
कपिल, धोनी , रोहित की कतार में सूर्या
अहमदाबाद की जीत ने सूर्या को उस एलीट क्लब में शामिल कर दिया है जहाँ कपिल देव, महेंद्र सिंह धोनी और रोहित शर्मा जैसे नाम दर्ज हैं. यह ट्रॉफी उस 25 साल लंबी यात्रा की मुहर है जो मुंबई के एक छोटे से कैंप से शुरू हुई थी. मगर सूर्या के लिए यह अंत नहीं है. वे अब 2028 ओलंपिक स्वर्ण पदक का सपना देख रहे हैं. वह लड़का, जो कभी मैदान छोड़कर घर नहीं जाना चाहता था, आज भी वहीं खड़ा है. वह अभी भी खेलना चाहता है. अभी भी सीखना चाहता है. और सबसे बड़ी बात, वह अभी भी मैदान पर थोड़ा और वक़्त रुकना चाहता है.
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