न्यूयॉर्क के ‘ईस्ट विलेज’ के पॉश रेस्त्रां से लेकर पेरिस, बर्लिन और सिडनी के नाइट क्लबों तक जहां कभी बेस गिटार की धुन सुनाई देती थी, वहां अब ‘पोंग’, ‘चाऊ’ और ‘कांग!’ जैसी आवाजें गूंज रही हैं। यह शोर है टाइल गेम ‘महजोंग’ के प्लेयर्स का। अब तक माना जाता था कि रिटायर्ड या बुजुर्ग ही इस गेम में रुचि दिखाते हैं। पर इन दिनों चीन के इस पारंपरिक खेल में दुनियाभर के युवा जुड़ रहे हैं। 19वीं सदी के मध्य में शंघाई से शुरू हुआ ‘महजोंग’ (जिसका अर्थ है ‘गौरैया’) गोटियों के टकराने की खास आवाज के लिए जाना जाता है। ‘इवेंटब्राइट’ के आंकड़ों के अनुसार, बीते सालभर में महजोंग इवेंट्स में लोगों की मौजूदगी तीन गुना बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर इससे जुड़ा कंटेंट 70% बढ़ चुका है, जहां युवा चमकदार टाइल्स की ‘अनबॉक्सिंग’ करते व दोस्तों के साथ घंटों खेलते दिख रहे हैं। महजोंग की इस वापसी में फिल्मों और मशहूर हस्तियों का भी बड़ा हाथ है। मेगन मर्केल को उनकी डॉक्यू सिरीज में महजोंग नाइट होस्ट करते दिखाया गया है, तो फिल्म ‘क्रेजी रिच एशियन्स’ ने इस खेल की रणनीति व गंभीरता को युवाओं का पसंदीदा बना दिया है। प्रादा, हर्मेस व लुई वितां ने खास महजोंग सेट बाजार में उतारे हैं। लुई वितां का ‘वैनिटी महजोंग ट्रंक’ 54 लाख रु. का है। यह अब ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है। ‘ग्रीन टाइल सोशल क्लब’ की सह-संस्थापक सारा टेंग कहती हैं,‘महामारी के बाद लोग स्क्रीन से दूर होकर आमने-सामने मिलना चाहते थे। महजोंग इस कमी को पूरा करता है। खेल के दौरान जब टाइल्स को मिलाया जाता है, तब बातचीत के लिए काफी समय मिलता है। मेज पर बैठे चार लोग एक-दूसरे की आंखों में देखते हैं, रणनीति समझते हैं और इस बहाने नए दोस्त बनाते हैं। कार्ड गेम जैसा महजोंग 4 खिलाड़ियों के बीच खेला जाता है। कुल 144 टाइल्स होती हैं, जिन पर अलग-अलग चीनी अक्षर व प्रतीक बने होते हैं। हर खिलाड़ी को तय संख्या में टाइल्स दी जाती हैं। खिलाड़ी एक टाइल उठाता है और एक छोड़ता है। लक्ष्य समान पैटर्न बनाना होता है। पूरा हैंड बनाने वाला खिलाड़ी ‘महजोंग’ घोषित करता है। यह कार्ड गेम रम्मी जैसा है। इसलिए भारत में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। अवसाद में कमी, याद रखने की क्षमता बढ़ाता है यह खेल – एक्सपर्ट डिजिटल हो चुकी दुनिया में लोग कुछ ऐसा छूना व महसूस करना चाहते हैं जो असली हो। इतिहासकार एनेलीज हेंज कहती हैं,‘महजोंग की टाइल्स छूने, उन्हें सहेजने व उनके टकराने की आवाज में अलग ही सुकून है। यह खेल सिर्फ दिमाग की कसरत नहीं है, बल्कि डिजिटल डिटॉक्स’ का जरिया भी है।’ शोध बताते हैं कि नियमित महजोंग खेलने वाले बुजुर्गों में अवसाद कम होता है। यह खेल याददाश्त व पैटर्न पहचान की क्षमता बढ़ाता है। इसलिए युवा भी इसे अपनाकर बुढ़ापे से पहले दिमाग को सक्रिय रख रहे हैं।
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