fight between players at ground: वेस्ट जोन के गेंदबाज राशिद पटेल और नॉर्थ जोन के आक्रामक बल्लेबाज रमन लांबा के बीच तीखी बहस चल रही थी. माहौल इतना गर्म था कि अचानक खेल की मर्यादा तार-तार हो गई.
1991 में भारत के जमशेदपुर ने देखा था क्रिकेट इतिहास का ब्लैक फ्राई-डे
दलीप ट्रॉफी का फाइनल मैच चल रहा था. दो ताकतवर टीमें नॉर्थ जोन और वेस्ट जोन आमने-सामने थीं. मैदान पर दिग्गज खिलाड़ी मौजूद थे, लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आज खेल के मैदान पर एक ऐसा खौफनाक इतिहास रचा जाएगा, जिसे आने वाली कई पीढ़ियां ‘शर्मनाक’ कहेंगी.
मैच में पहले ही काफी स्लेजिंग और कहा-सुनी हो रही. वेस्ट जोन के गेंदबाज राशिद पटेल और नॉर्थ जोन के आक्रामक बल्लेबाज रमन लांबा के बीच तीखी बहस चल रही थी. माहौल इतना गर्म था कि अचानक खेल की मर्यादा तार-तार हो गई. जैसे ही रमन लांबा ने कुछ कहा, राशिद पटेल ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया। उन्होंने जो किया वो क्रिकेट जगत ने पहले कभी नहीं देखा था. राशिद ने जमीन से स्टंप उखाड़ा और लांबा की तरफ उसे ‘भाले’ की तरह तानकर हमला करने दौड़ पड़े.
जंग के मैदान में तब्दील हो गया मैच
इन दिनों इंग्लैंड में बस चुके रशीद पटेल ने 45 साल पहले जब स्टंप लेकर आगे बढ़े तो रमन लांबा अपनी जान बचाने के लिए पिच पर इधर-उधर भागने लगे. अपनी रक्षा के लिए उनके पास सिर्फ उनका बल्ला था, जिसे वो एक ‘ढाल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे थे ताकि स्टंप का हमला उनके सिर या छाती पर न लग जाए. मैदान पर मौजूद युवा खिलाड़ी अजय जडेजा जब बीच-बचाव के लिए आए, तो वो भी इस हिंसा की चपेट में आ गए और उन्हें चोटें आईं. मैदान पर खेल रुक चुका था और उसकी जगह डर और अफरा-तफरी ने ले ली थी.
इतिहास में पहली और आखिरी बार
खिलाड़ियों को आपस में लड़ता देख स्टेडियम में मौजूद भीड़ भी बेकाबू हो गई. स्टैंड्स से पथराव शुरू हो गया. हालात इतने बेकाबू हो गए कि खिलाड़ियों को भागकर ड्रेसिंग रूम में छिपना पड़ा. यह भारतीय प्रथम श्रेणी क्रिकेट के इतिहास का पहला और इकलौता ऐसा मामला बना, जहाँ बारिश या खराब रोशनी नहीं, बल्कि खिलाड़ियों की आपसी ‘मारपीट’ के कारण एक आधिकारिक मैच को बीच में ही रद्द करना पड़ा.
न इससे पहले ऐसा कभी हुआ था, और न ही उसके बाद दोबारा कभी ऐसी नौबत आई.
कड़ी कार्रवाई से करियर पर लगा ग्रहण
बीसीसीआई ने इस घटना को खेल की भावना के खिलाफ माना और सख्त कदम उठाते हुए राशिद पटेल पर 13 महीने का कड़ा प्रतिबंध लगाया गया. रमन लांबा को भी उकसाने और व्यवहार के लिए 10 महीने के लिए बैन कर दिया गया. यह मैच आज भी याद दिलाया जाता है यह बताने के लिए कि क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं है, यह अनुशासन और सम्मान की परीक्षा भी है. जमशेदपुर का वो दिन आज भी क्रिकेट इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है.
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